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| कछवाह राजवंश का राजस्थान में आगमन |
पिछले लेख में हमने आपको बताया था कि मध्यप्रदेश से आकर दुल्हेराय कछवाह — जिन्हें इतिहास में दुर्लभराय और तेजकरण के नाम से भी लिखा गया है — उन्होंने राजस्थान में कछवाह राज्य की नींव रखी। आज हम बात करेंगे — आखिर दुल्हेराय जी को मध्यप्रदेश छोड़कर राजस्थान क्यों आना पड़ा?
सबसे पहले चलते हैं इतिहास की पुस्तकों की तरफ। कूर्मयश कलानिधि के लेखक कविराज मोहन सिंह लिखते हैं — “पितु ईसरसिंह था सोढ का सो दिय दान में राज्य जंवाइय की” यानि सोढ़देव के पिता ईश्वर सिंह, जिन्हें ख्यातों में ईसदेव भी लिखा गया है, उन्होंने अपना राज्य अपने दामाद को दान में दे दिया था।
अब सोचिए — जब पिता ने ही राज्य दान में दे दिया, तो वहाँ रहना संभव नहीं था। ऐसी स्थिति में दुल्हेराय जी ने नया राज्य स्थापित करने का निर्णय लिया। उनका विवाह राजस्थान के मोरा के चौहान शासक रालनसिंह की पुत्री से हुआ था। उस समय दौसा पर आधा अधिकार चौहानों का था और आधा बड़गूजरों का। दोनों के बीच अनबन चल रही थी। चौहानों ने दुल्हेराय जी को संदेश भेजा — आप राजस्थान आ जाइए, हम दौसा का अपना हिस्सा मजबूत करने में आपकी मदद करेंगे।
दुल्हेराय जी इस निमंत्रण को स्वीकार कर मध्यप्रदेश से राजस्थान आए। चौहानों की सहायता से उन्होंने दौसा पर अधिकार कर लिया। लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं होती… उस समय बड़गूजरों में देवती के राजा प्रमुख थे बड़गूजरों ने देवती जाकर सहायता मांगी। देवती की सेना दौसा पहुँची, लेकिन दुल्हेराय जी ने उन्हें परास्त कर भगा दिया।
अब बात करते हैं उस दूसरी कहानी की — जो कछवाहों की वंशावली की पुस्तक में मिलती है। देवीसिंह जी महार ने बड़वों की पुरानी पोथियों के आधार पर लिखा है कि ग्वालियर का शासन खोने का कारण कुलदेवी की नाराजगी थी। कहा जाता है कि ईसदेव तांत्रिक ब्राह्मणों के प्रभाव में आ गए और उन्होंने कुलदेवी अम्बामाता को बकरों की बलि और शराब चढ़ाना शुरू कर दिया।
कुलदेवी ने स्वप्न में चेतावनी दी — “यह मदिरा और मांस बंद करो, वरना मैं तुम्हारा राज्य नष्ट कर दूँगी।” लेकिन ईसदेव ने इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया। एक दिन शिकार के दौरान उनका तीर शेर की जगह उनके बहनोई को लग गया और उनकी मृत्यु हो गई। उस रात कुलदेवी ने फिर स्वप्न में कहा — “देख लिया मेरा प्रकोप? अब भी संभल जाओ, नहीं तो वंश का नाश कर दूँगी।”
इस चेतावनी से भयभीत होकर ईसदेव ने राज्य त्याग दिया। वे करौली और मध्यप्रदेश की सीमा पर नादरबाड़ी के पास जंगलों में तपस्या करने लगे और वहीं उनका देहांत हो गया। उनके पुत्र सोढ़देव और पृथ्वीसिंह सेना सहित अयोध्या के लिए निकले। मार्ग में अमेठी के भर राजा से युद्ध हुआ और अमेठी में राज्य स्थापित किया।
इसके बाद सोढ़देव के पुत्र दुल्हेराय अपने ससुर के निमंत्रण पर दौसा पहुँचे। बड़गूजरों के आधे हिस्से पर विजय प्राप्त की। बाकी आधा हिस्सा उनके ससुर ने उन्हें दे दिया। फिर दुल्हेराय जी ने अपने पिता सोढ़देव को भी दौसा बुला लिया। ध्यान देने वाली बात यह है कि अमेठी का राजतिलक पृथ्वीसिंह के पुत्र इन्द्रमणि का हुआ और दौसा का राजतिलक दुल्हेराय जी का। सोढ़देव और पृथ्वीसिंह ने स्वयं राजतिलक नहीं करवाया।
कुछ इतिहासकार मानते हैं कि कुलदेवी के प्रकोप के भय से उन्होंने स्वयं राज्य ग्रहण नहीं किया।
अब तीसरा दृष्टिकोण…इतिहास शोधार्थी भारत हुड्डा लिखते हैं कि ईशासिंह की जागीर करौली और बहादुरपुर के पास डाँग क्षेत्र में थी। यह क्षेत्र पठारी और जंगलों वाला था। दुल्हेराय वीर तो थे ही, साथ ही महत्वाकांक्षी भी थे। उन्हें यह छोटा और जंगलों वाला इलाका पसंद नहीं था। इसलिए उन्होंने पिता की अनुमति लेकर इस क्षेत्र को छोड़ा और अपने श्वसुर की सहायता से पहले खोहगाँव पर अधिकार किया। फिर आगे बढ़ते हुए बाणगंगा के किनारे स्थित दौसा पहुँचे। वहाँ बड़गूजरों की स्वतंत्र शाखा शासन कर रही थी। उन्हें हराकर दुल्हेराय जी ने राजस्थान में कछवाह राज्य की नींव रखी।
अब सबसे बड़ा प्रश्न — दुल्हेराय जी राजस्थान कब आए? इस विषय पर इतिहासकारों में मतभेद है। इनेस्टिक हिस्ट्री ऑफ नॉर्थ इंडिया में 1128 ई. बताया गया है। वीरसिंह तंवर और रावल नरेन्द्रसिंह जोबनेर के अनुसार वि.सं. 1155 से 1184 के बीच। देवीसिंह जी मंडावा के अनुसार सही समय वि.सं. 1160 से 1190 के बीच माना जाना चाहिए। इतिहासकार ओझाजी ने वि.सं. 1194 के आसपास माना है। इम्पीरियल गजेटियर में 1128 ई. यानी वि, सं. 1185 दिया गया है। इतिहासकार जगदीश सिंह गहलोत भी वि.सं. 1194 को सही मानते हैं। जबकि जयपुर राज्य अभिलेखागार में संरक्षित वंशावली के अनुसार दुल्हेराय का शासन माघ सुदी 7, वि. 1063 से माघ सुदी 7, 1093 तक माना गया है। इतने मतभेदों के बीच शोधार्थी भारत हुड्डा का मत वंशावली आधारित तिथि को अधिक प्रमाणिक मानता है। क्रमशः..........
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